काशी विश्वनाथ शिवलिंग (Kashi Vishwanath Jyotirlinga) : गंगा नदी के घाट पर स्थित काशी विश्वनाथ शिवलिंग (Kashi Vishwanath Jyotirlinga) 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। काशी का यह स्थान भगवान शिव की सबसे प्रिय जगह मानी जाती है। प्राचीन मान्यता के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन से पहले भैरो जी के दर्शन करना चाहिए, क्युकी ऐसा करने वाले भक्तों से भगवान शिव हमेशा प्रसन्न रहते हैं। एक पुरानी कहावत के अनुसार जो व्यक्ति काशी नगर में रहकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, उन्हें स्वर्ग नसीब होता है, और उनके जीवन में किये गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। कहा जाता है कि काशी नगर में एक स्थान पर माता पार्वती की कर्णमाला गिर गयी थी, इस घटना के चलते, उस स्थान का नाम मणिकर्णिका शक्तिपीठ रख दिया गया था। काशी विश्वनाथ शिवलिंग (Kashi Vishwanath Jyotirlinga) मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित है, जिसके एक भाग में माता पार्वती और दुसरे भाग में महादेव विराजमान हैं। इस मंदिर से जुडी विष्णु और ब्रम्हा के अहंकार की कहानी और मंदिर से जुड़े अनसुने रहस्यों को जानने के लिए इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास (Kashi Vishwanath Jyotirlinga Mandir History)
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास स्कन्द पुराण के काशी भाग में देखा जा सकता है, जिसके अनुसार इस मंदिर का कई बार पुनः निर्माण हो चूका है। काशी विश्वनाथ मंदिर को प्राचीन काल में 1194 ई में मुहम्मद गौरी और उनकी सेनाओं ने मिलकर कन्नौज के राजा को परास्त कर, मंदिर पर पूर्णरूप से अपना कब्ज़ा कर लिया था। कुछ समय के पश्चात मुहम्मद गौरी ने इस मंदिर को तुडवा दिया और मंदिर तहस नहस कर दिया।
मुहम्मद गौरी के बाद दिल्ली के प्राचीन शासक इल्तुतमिश ने इस मंदिर का दुबारा पुननिर्माण कराया था। लेकिन मंदिर की बादनसीबी के चलते 1505 से 1515 ई के मध्य सिकंदर लोधी द्वारा मंदिर को फिर से ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद मुग़ल शाशन काल के दौरान राजा मान सिंह ने इस मंदिर को फिर से पुननिर्माण करवाया। कुछ साल बाद 1669 ई में औरंगजेब के राजस्व में मंदिर को नष्ट कर दिया गया और इस जगह ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया।
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इसके बाद मंदिर के ध्वस्त और निर्माण होने का कार्य काफी वर्षों तक चला। कुछ सालों के पश्चात 1780 ई में वर्तमान के काशी विश्वनाथ का निर्माण हो पाया, जिसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होक्लर ने बनवाया। इसके बाद 1853 ई में मंदिर के स्वरूप को बेहतर करने के लिए, महाराजा राजित सिंह ने एक हजार किलो सोना दान में दिया। समय के साथ 1983 ई में यह मंदिर पूरी तरह से उत्तर प्रदेश के शासक की संपत्ति बन चूका था, जिसे डॉक्टर विभूति नारायण और काशी नरेश ने नए मंदिर का रूप दिया।
वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर त्रिभुजाकार अवस्था में स्थापति है। मंदिर की दीवारों को काले पत्थरों से निर्मित किया गया है। मंदिर का छत सोने से तरासा गया है।
काशी विश्वनाथ शिवलिंग (Kashi Vishwanath Jyotirlinga) मंदिर से जुडी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां नीचे टेबल में देख सकते हैं।
मंदिर का नाम | काशी विश्वनाथ शिवलिंग मंदिर (Kashi Vishwanath Jyotirlinga Temple) |
स्थपना समय | 1780 ई |
पूजनीय देवता | भगवान शिव |
मंदिर से जुड़े पर्व | प्रदोष व्रत, शिवरात्रि, नाग पंचमी, अक्षया तृतीय |
जगह का नाम | लाहोरी तोला वाराणसी, उत्तर प्रदेश |
सम्बंधित धर्म | हिन्दू |
मंदिर निर्माण शैली | हिन्दू वास्तुकला |
मंदिर के निर्माता | महारानी अहिल्या बाई होलकर |
काशी विश्वनाथ मंदिर की आरती | मंगला आरती, भोग आरती, संध्या आरती, सृगार आरती, शयन आरती |
मंदिर की विशेषता | मंदिर में सोने का छत्र, |
दर्शन का समय | 3:00 बजे सुबह – 10:30 रात तक |
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का रहस्य (Kashi Vishwanath Temple Mystery)

काशी को महादेव का सबसे प्रिय स्थान मना जाता है, इस बात का सत्यापन प्राचीन पुरानो में मिलता है। इसी मंदिर में भगवान के रूप में ज्योतिर्लिंग को स्थापित किया गया है। मंदिर की ख़ास बात यह है कि यहाँ भगवान शिव के साथ माता पार्वती को स्थापित किया गया है। मंदिर से जुड़े ऐसे अनेकों रहस्य हैं, जिसके बारे में आम इंसान नहीं जानता होगा, लेकिन आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से उन सभी रहस्यों से पर्दा उठाने वालें है, जिनको सुनकर आप आश्चर्य चकित रह जायेंगे। चलिए इन सभी रहस्यों को विस्तार से जानते हैं।
- एक कहावत के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के त्रिशूल पर टिका है।
- काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath Jyotirlinga) मंदिर की विशालकाय ऊंचाई 15.5 मीटर है।
- इस मंदिर में शिवरात्री और नागपंचमी जैसे पर्व को ख़ास मान्यता दी जाती है।
- प्राचीन ग्रंथो के अनुसार जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था, तब सूर्य की पहली किरण काशी नगर की भूमि पर पड़ी थी।
- काशी विश्वनाथ मंदिर की एक विशेषताएं यह है कि यहां पर शिवलिंग के पास चौकोर वेदी स्थापित किया गया है तथा मंदिर में विष्णु और गौरी को भी स्थापित किया गया है।
- काशी विश्वनाथ मंदिर के समीप गंगा नदी का वास है, जो श्रद्धालु गंगा नदी का स्नान करके मंदिर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते हैं उनके जीवन में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का निर्माण करते समय इसमें 1000 किलो सोने का उपयोग किया गया है।
- इतिहास के अनुसार पंजाब के महाराज रणजीत सिंह ने मंदिर निर्माण के लिए 1000 किलोग्राम सोना दान किया था।
- प्राचीन इतिहास के अनुसार मंदिर के पास एक कुआं स्थापित किया गया है जिसे ज्ञानवापी के नाम से जाना जाता है।
- काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर में रोजाना पांच तरह की आर्तियां की जाती हैं, जिसमें से मंगला आरती, भोग आरती, संध्या आरती, श्रृंगार आरती, संध्या आरती प्रमुख हैं।
- काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के छत को बनाते समय इसमें सोने का उपयोग किया गया था, इसलिए मंदिर की छत को सोने की छत के रूप में जाना जाता है। एक कहावत के अनुसार जो व्यक्ति इस छत के दर्शन करने के बाद, किसी तरह की मनोकामना रखता है तो उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती है।
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी (Kashi Vishwanath Temple Story)
काशी विश्वनाथ को वाराणसी के नाम से भी जाना जाता है। काशी विश्वनाथ एक धार्मिक स्थल है, जहाँ पर भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्थापित है। जैसा की हम सभी जानते हैं की भारत में कुल 12 ज्योतिर्लिंग मौजूद हैं, जिसमे हर किसी ज्योतिर्लिंग के पीछे अनेकों कहानिया जुडी हैं। इसी तरह काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के भी कई कहानियाँ जुडी हैं। इनमे से एक कहानी आप के साथ शेयर करने वाले हैं, जिसे आप आगे पढ़ सकते हैं।
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को लेकर एक पोराणिक कहानी प्रचलित है जिसके अनुसार-
एक बार आकाश लोग में ब्रम्हा और विष्णु जी के बिच वाद विवाद होने लगा, जिसमे दोनों एक दुसरे को श्रेष्ट बताने लगे। जब भगवान् शिव को इस बात का पता चला तो, वह स्वयं ब्रम्हा और विष्णु जी के पास गए। वहां पहुचकर भगवान शिव ने दोनों देवताओं से कहा कि आप लोग परेशान ना हों, आप दोनों में से कौन श्रेष्ट है अभी पता चल जाएगा।
तब शिव जी ने दोनों देवताओं को कहा की मै यहाँ पर ज्योतिर्लिंग का रूप धारण करूँगा, आप दोनों को मेरे श्रोत और ऊंचाई का पता लगाना होगा। जो भी इस बात का पता लगा लेगा वह श्रेष्ट मना जाएगा। तब भगवान शिव ने विशालकाय शिवलिंग का रूप धारण कर लिया, और ब्रम्हा और विष्णु अपने कार्यों में लग गए।
इस दौरान भगवान विष्णु ने शिवलिंग के श्रोत का पता लगाते हुए जमीन के अंदर खुदाई करना शुरू कर दी, और दूसरी तरफ ब्रम्हा जी ने हंस का रूप धारण कर शिवलिंग की ऊंचाई का पता लगाने की चेष्टा की। काफी समय बीतने के बाद विष्णु जी ने हार मान ली और शिवलिंग का स्रोत पता लगाने में असमर्थ रहे। वहीँ दूसरी तरफ ब्रम्हा जी भी ऊंचाई का पता लगाने में असमर्थ रहे, लेकिन उन्होंने भगवान शिव से झूठ बोला कि उन्हें शिवलिंग के शीर्ष का पता चल गया है। लेकिन भगवान शिव ने अपनी द्रिव्दृष्टि से सच्चाई का पता लगा लिया। इस झूठ से भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित हुए और ब्रम्हा जी को श्राप दे दिया। श्राप के अनुसार ब्रम्हा जी को संसार में कभी नहीं पूजा जाएगा।
इस कहानी के अनुसार जहां पर भगवान शिव ने ज्योतिर्लिंग का रूप धारण किया था, उसी जगह काशी विश्नाथ शिवलिंग (Kashi Vishwanath Temple) स्थापित किया गया।
काशी विश्वनाथ मंदिर जाने का आसान रास्ता (How To Reach Kashi Vishwanath Temple)

काशी नगर अपने आनेको चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है और भगवान शिव का सबसे प्रिय स्थान है, यहां पर भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्थापित किया गया है। अगर आप वाराणसी में स्थित इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना चाहते हैं, और अपने शहर से मंदिर जाने वाले रास्ते को लेकर कन्फ्यूज हैं तो आपको यह आर्टिकल जरूर पढ़ना चाहिए। यहां पर हम मंदिर को जाने वाले रास्तों के बारे में चर्चा करेंगे, जोकि आपके शहर से मंदिर की यात्रा को काफी आसान बना देंगे। चलिए मंदिर को जाने वाले 3 तरह के रास्तों के बारे में विस्तार से जानते हैं।
सड़क के रास्ते से कैसे जा सकते हैं
अनेकों शहर की सड़कें वाराणसी के हाईवे से जुड़ी हैं, उत्तर प्रदेश के राज्य के नजदीकी राज्यों से मंदिर पहुंचने लिए बस जैसी सुविधाएं उपलब्ध है, बस की मदद से वाराणसी बस अड्डे तक पहुंचा जा सकता है, यहां से आप यातायात के छोटे साधनों की मदद ले सकते हैं और मंदिर तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा मंदिर तक का सफर कर तय करने के लिए खुद की गाड़ी भी बुक कर सकते हैं।
ट्रेन की मदद से मंदिर कैसे पहुंचे
अगर आप अपने शहर से मंदिर तक जाने के लिए ट्रेन द्वारा सफर तय करना चाहते हैं, तब आपको अपने शहर से वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन तक की टिकट बुक करनी पड़ेगी। वाराणसी जंक्शन से मंदिर तक की दूरी लगभग 5 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से मंदिर तक जाने के लिए आप यातायात के छोटे साधनों का उपयोग कर सकते हैं जैसे टैक्सी, ऑटो और अन्य सुविधाएं।
हवाई जहाज से मंदिर तक कैसे पहुंचे
अगर आप काशी विश्वनाथ मंदिर तक पहुंचाने के लिए, पैसे खर्च करने में समर्थ है, तब आपको अपने शहर से लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट तक की फ्लाइट टिकट बुक कर सकते हैं। मंदिर से इस एयरपोर्ट की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है एयरपोर्ट पहुंचने के बाद आप वहां से टैक्सी या ऑटो की सहायता से मंदिर पहुंच सकते हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन समय (Kashi Vishwanath Temple Visiting Timing)
काशी विश्वनाथ भारत के सबसे विशाल मंदिरों में से एक है, इसी वजह से यहाँ पर आने वाले भक्तों की संख्या में इजाफा देखा जा सकता है। मंदिर के दर्शन के समय यहाँ पर भारी भीड़ एकत्रित हो जाती है। अगर आप मंदिर की समय सरणी के बारे में जान ले, तो आप सही समय पर मंदिर के दर्शन कर सकते हैं, और हजारों लोगो की भीड़ से भी बच सकते हैं। हम यहाँ पर मंदिर से जुड़े कुछ ख़ास टाइम को आपके साथ शेयर करने जा रहें, जिन्हें आप जिचे दी गयी टेबल में पढ़ सकते हैं।
मंदिर द्वार खुलने का समय | 2:30 रात्री पहर |
सुबह की आरती (मंगला आरती) | 3:00 – 4: 00 प्रातःकाल |
भोग आरती का समय | 11: 15 से 12: 20 दोपहर |
संध्या आरती का समय | 7:00 से 8: 15 शाम के पहर |
श्रींगार आरती का समय | 9:00 से 10: 00 रात के पहर |
शयन आरती का समय | 10:00 से 10: 40 रात के पहर |
मंदिर बंद होने का समय | 11:00 बजे रात्रि पहर |
FAQ
काशी विस्वनाथ मंदिर के दर्शन के लिए कितना चार्ज लगता है।
काशी विस्वनाथ मंदिर के दर्शन के लिए किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जाता, यहाँ पर दर्शन निशुल्क है।
क्या काशी विस्वनाथ मंदिर के पास कोई मस्जिद स्तिथ है?
जी हाँ, काशी विश्वनाथ मंदिर के पास ज्ञानवापी मस्जिद स्थित है, जिसका निर्माण औरंगजेब ने करवाया था।
काशी विस्वनाथ मंदिर के दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय का होता है?
मंदिर में दर्शन के लिए नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी, फ़रवरी महीना सही होता है, क्यूंकि अन्य महीनो में यहाँ पर बहुत ज्यादा गर्मी और बारिश होती है।
काशी विश्वनाथ मंदिर कब खुलता है?
आपको यह जानकार बड़ी हैरानी होगी कि काशी विश्वनाथ मंदिर का द्वार रात को 2:30 बजे ही खोल दिया जाता है।
काशी नगरी भगवान शिव के अस्त्र से कैसे जुडा है?
प्राचीन ग्रंथो के अनुसार काशी नगर भगवान शिव के त्रिशूल पर टिका है।
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